Sunday, March 3, 2013

आधुनिक युग में दलित-पिछड़े और ब्राह्मण दोनों जाति -प्रथा के समर्थक क्यों ?

हिन्दू कभी एक नहीं हो सकते है क्योंकि एक तरफ कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रेरित और चर्च से समर्थित दलित और पिछड़े वर्ग के बुद्धिजीवी ब्राह्मणों और उच्च वर्ग के खिलाफ विष वमन कर रहे है वही दूसरी तरफ ब्राह्मण वर्ग बहुत आहत है कि कुछ लोग उन्हें जन्म से ब्राह्मण मानने के लिए तैयार नहीं हो रहे है , वे उन्ही धर्म ग्रंथों के " ब्राह्मण " होने की शर्तों को स्वीकार नहीं कर रहे जिन्हें शायद उन्ही के पूर्वजों ने ही लिखा था , यदि आज के ब्राह्मण खुद को जन्म से ब्राह्मण कहने के तर्क देंगे तो स्वाभाविक है की वो दलितों को जन्म के आधार पर दलित ही मानेंगे ... और फिर दलित अपने पूर्वजो पर किये अत्याचार याद करेंगे ( वे 1000 साल के मुस्लिम और 200 साल के अंग्रेजों के अत्याचार भूल जायेंगे )... और फिर दलित -ब्राह्मण झगड़ा जारी रहेगा . दलित हिन्दू धर्म से नहीं जुड़ेगा और कम्युनिस्ट और चर्च मिशनरीज का काम आसान हो जायेगा (जैसा कि केरल ,नागालैंड , मणिपुर , तमिलनाडु में हुआ और त्रिपुरा , आसाम, झारखंड , आंध्र , छतीसगढ़ , उड़ीसा में जारी है ) . हिन्दू धर्म में दो पक्ष होंगे ... दो विरोधी पक्ष .. क्योकि दलित और पिछड़े भी आरक्षण के मोह के कारण सिर्फ नाम के लिए हिन्दू होने का टैग लगाये रखेंगे . तो एक प्रकार से ब्राह्मण और दलित-पिछड़े दोनों ही जाति प्रथा का समर्थन कर रहे है।ब्राह्मण अपने को जन्म-जात मिलने वाले सम्मान , मंदिरों में पुजारी होने , कर्मकांड कराने के लिए और भगवान के एजेंट के रूप में और दलित-पिछड़े आरक्षण के लाभ लिए . हिन्दू एक नहीं हो सकते इसका सबसे अच्छा उदाहरण अभी देखने को मिला जब हिंदुयों के प्रिय मोदी ने जाति प्रथा समाप्त करने के प्रयास और दलितों को मुख्य धारा में लाने के लिए उन्हें मंदिर में पुजारी होने का प्रशिक्षण देने की बात कही . तो फिर क्या था .. कभी उन्ही के समर्थक रहे कुछ ब्राह्मण अचानक से उन्हें भी गाली देने लगे और जो ब्राह्मण उनके पहले से विरोधी थे उन्हें तो एक और मुद्दा मिल गया मोदी के खिलाफ लिखने के लिए . तर्क और पुराणों से श्लोक आने लगे कि "ब्राह्मण केवल ब्राह्मण के गर्भ से ही पैदा होता है ....ब्राह्मण कोई भी नहीं बनेगा .. केवल जन्म से ही होगा" जो सवर्ण इन ब्राह्मणों के तर्कों का विरोध करता और हिन्दू एकता की बात करता है तो उसे उत्तर मिलता " दलित को दामाद बना लो .. यदि आप दलितों से पारिवारिक सम्बन्ध नहीं बना सकते तो ईश्वर अपनी पूजा .. अपनी आरती में ब्राह्मण छोडके अन्य को क्यों झेले------गैर ब्राह्मणों से श्राद्धों में पितर शांति की पूजा करवा के दख लो " ये वही लोग है जो कभी हिन्दू धर्म की एकता की बाते करते थे ,लेकिन वास्तविकता ये है कि सिर्फ अपनी राजनीति के लिए और जब उन्हें मुस्लिम अत्याचारों से डर लगता है अन्यथा ब्राह्मणों के इस विशेष वर्ग को हिन्दुओं को एकता से कोई लेना देना नहीं क्योकि वे जन्मजात श्रेष्ठ है ईश्वरीय अंश और बाकि सभी जातियां जो हिन्दू धर्म में उनके लिए सौभाग्य की बात है कि उन्हें इन ब्राह्मणों के दर्शन हो रहे है . ये लोग सभी वैदिक श्लोकों को नहीं मानते जिनमे " ब्राह्मण होने की निम्न शर्ते दी गयी है .....
जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात्‌ भवेत द्विजः। वेद पाठात्‌ भवेत्‌ विप्रःब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः।। अर्थात - व्यक्ति जन्मतः शूद्र है। संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। किंतु जो ब्रह्म को जान ले, वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधिकारी है।
विद्या तपश्च योनिश्च एतद् ब्राह्मणकारकम्। विद्यातपोभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव स:॥ अर्थात- ''विद्या, तप और ब्राह्मण-ब्राह्मणी से जन्म ये तीन बातें जिसमें पाई जायँ वही पक्का ब्राह्मण है, पर जो विद्या तथा तप से शून्य है वह जातिमात्र के लिए ब्राह्मण है, पूज्य नहीं हो सकता'' (पतंजलि भाष्य 51-115)। चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः । तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥ गीता॥४-१३॥ अर्तार्थ ब्राह्मण, क्षत्रिया , शुद्र वैश्य का विभाजन व्यक्ति के कर्म और गुणों के हिसाब से होता है, न की जन्म के.
एकवर्ण मिदं पूर्व विश्वमासीद् युधिष्ठिर ।। कर्म क्रिया विभेदन चातुर्वर्ण्यं प्रतिष्ठितम्॥ सर्वे वै योनिजा मर्त्याः सर्वे मूत्रपुरोषजाः ।। एकेन्दि्रयेन्द्रियार्थवश्च तस्माच्छील गुणैद्विजः ।। शूद्रोऽपि शील सम्पन्नों गुणवान् ब्राह्णो भवेत् ।। ब्राह्णोऽपि क्रियाहीनःशूद्रात् प्रत्यवरो भवेत्॥ (महाभारत वन पर्व) न शूद्रा भगवद्भक्ता विप्रा भागवता: स्मृता: । सर्ववर्णेषु ते शूद्रा ये ह्यभक्ता जनार्दने ॥ (महाभारत) यदि भगवदभक्त शूद्र है तो वह शूद्र नहीं, परमश्रेष्ठ ब्राह्मण है । वास्तव में सभी वर्णों में शूद्र वह है, जो भगवान की भक्ति से रहित है। पहले एक ही वर्ण था पीछे गुण, कर्म भेद से चार बने ।। सभी लोग एक ही प्रकार से पैदा होते हैं ।। सभी की एक सी इन्द्रियाँ हैं ।। इसलिए जन्म से जाति मानना उचित नहीं हैं ।। यदि शूद्र अच्छे कर्म करता है तो उसे ब्राह्मण ही कहना चाहिए और कर्तव्यच्युत ब्राह्मण को शूद्र से भी नीचा मानना चाहिए ।। क्षत्रियात् जातमेवं तु विद्याद् वैश्यात् तथैव च॥ (मनुस्मृति) आचारण बदलने से शूद्र ब्राह्मण हो सकता है और ब्राह्मण शूद्र ।। यही बात क्षत्रिय तथा वैश्य पर भी लागू होती है ।। आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः ।। (वशिष्ठ स्मृति) जातिरिति च ।। न चर्मणो न रक्तस्य मांसस्य न चास्थिनः ।। न जातिरात्मनो जातिव्यवहार प्रकल्पिता॥ (निरावलम्बोपनिषद्) जाति चमड़े की नहीं होती, रक्त, माँस की नहीं होती, हड्डियों की नहीं होती, आत्मा की नहीं होती ।। वह तो मात्र लोक- व्यवस्था के लिये कल्पित कर ली गई ।। आचरण हीन को वेद भी पवित्र नहीं करते ।। वेदाध्ययनमप्येत ब्राह्मण्यं प्रतिपद्यते ।। विप्रवद्वैश्यराजन्यौ राक्षसा रावण दया॥ शवृद चांडाल दासाशाच लुब्धकाभीर धीवराः ।। येन्येऽपि वृषलाः केचित्तेपि वेदान धीयते॥ शूद्रा देशान्तरं गत्त्वा ब्राह्मण्यं श्रिता ।। व्यापाराकार भाषद्यैविप्रतुल्यैः प्रकल्पितैः॥ (भविष्य पुराण) ब्राह्मण की भाँति क्षत्रिय और वैश्य भी वेदों का अध्ययन करके ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर लेता है ।। रावण आदि राक्षस, श्वाद, चाण्डाल, दास, लुब्धक, आभीर, धीवर आदि के समान वृषल (वर्णसंकर) जाति वाले भी वेदों का अध्ययन कर लेते हैं ।। शूद्र लोग दूसरे देशों में जाकर और ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि का आश्रय प्राप्त करके ब्राह्मणों के व्यापार, आकार और भाषा आदि का अभ्यास करके ब्राह्मण ही कहलाने लगते हैं ।। यजुर्वेद [32.16 ] में भगवान् से आदमी ने प्रार्थना की है की “हे ईश्वर, आप मेरी ब्राहमण और क्षत्रिय योग्यताएं बहुत ही अच्छी कर दो”. इससे यह साबित होता है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि शब्द असल में गुणों को प्रकट करते हैं न कि किसी आदमी को. ब्राह्मण किसे माना जाये ? (इसका उत्तर देते हुए उपनिषत्कार कहते हैं – ) जो आत्मा के द्वैत भाव से युक्त ना हो; जाति गुण और क्रिया से भी युक्त ण हो; षड उर्मियों और षड भावों आदि समस्त दोषों से मुक्त हो; सत्य, ज्ञान, आनंद स्वरुप, स्वयं निर्विकल्प स्थिति में रहने वाला , अशेष कल्पों का आधार रूप , समस्त प्राणियों के अंतस में निवास करने वाला , अन्दर-बाहर आकाशवत संव्याप्त ; अखंड आनंद्वान , अप्रमेय, अनुभवगम्य , अप्रत्येक्ष भासित होने वाले आत्मा का करतल आमलकवत परोक्ष का भी साक्षात्कार करने वाला; काम-रागद्वेष आदि दोषों से रहित होकर कृतार्थ हो जाने वाला ; शम-दम आदि से संपन्न ; मात्सर्य , तृष्णा , आशा,मोह आदि भावों से रहित; दंभ, अहंकार आदि दोषों से चित्त को सर्वथा अलग रखने वाला हो, वही ब्राह्मण है; ऐसा श्रुति, स्मृति-पूरण और इतिहास का अभिप्राय है ! इस (अभिप्राय) के अतिरिक्त एनी किसी भी प्रकार से ब्राह्मणत्व सिद्ध नहीं हो सकता ! आत्मा सैट-चित और आनंद स्वरुप तथा अद्वितीय है ! इस प्रकार ब्रह्मभाव से संपन्न मनुष्यों को ही ब्राह्मण माना जा सकता है ! यही उपनिषद का मत है ! वे इस तर्क को भी नकारते है "'ब्राह्मण' एवं 'विप्र' में फ़र्क है. ब्राह्मणत्व एक उपलब्धि है. विप्र एक जन्मजात वर्ण है जिनका शरीर एवं मन सतोगुण-प्रधान होता है." और दलित -पिछड़ा वर्ग अपने ऊपर 2000 वर्षों से हुए अत्याचारों का हिसाब मांग रहा है , वो मनुस्मृति और ब्राह्मणों के साथ ही हिन्दू देवी- देवताओं को भी गाली देने में व्यस्त है इतना व्यस्त कि सभी सवर्णों और ब्राह्मणों को गाली दे रहा है उन्हें जो ब्राह्मण और सवर्ण उसके हित बात करते है , उनके विकास के लिए बहुत कुछ किया , दलित -पिछड़ा वर्ग के लोगों ने कभी किसी ब्राह्मण या किसी सवर्ण को जिसने उनकी उन्नति-विकास और उन्हें मुख्य धारा में लाने के लिए, समाज में ऊँचा स्थान दिलाने के लिए बहुत कुछ किया , धन्यवाद तक नहीं दिया . दलित -पिछड़ा वर्ग बुद्धिजीवी वर्ग ने भी सिर्फ जाति प्रथा का समर्थन करते हुए अपनी ही जाति के महापुरुषों के गुण गाये . जिन ब्राह्मणों -सवर्णों ने उनको सभी के बराबर लाने के अथक प्रयास किये वे उनका कभी नाम भी नहीं लेते , उनके योगदान कभी नहीं वर्णन करते है . तो कैसे हिन्दू एकता हो सकती है कैसे जाति प्रथा ख़त्म हो सकती है ?? जो कभी बहुत ज्ञानी और विद्वान लोग थे उन्होंने समाज और देश की उन्नति के लिए वर्ण व्यवस्था बनायीं जैसे की आज एक इंडस्ट्री होती है जिसमे कुछ लोग मैनेजमेंट वाले होते , कुछ लोग फाइनेंस देखते है , कुछ लोग इंजिनियर होते है , कुछ लोग मार्केटिंग में होते है और कुछ लोग वर्कर होते ... यदि ये सब जन्मजात होने लगे तो कैसा रहेगा ?? क्या वो इंडस्ट्री ग्रोथ कर पायेगी ?? फिर कोई धर्म कैसे बच पायेगा जिसमे व्यक्ति की महानता उसके जन्म से हो उसके गुण सभी जन्मजात होता हो ? -चन्द्रभाल सिंह